भारत बनेगा ग्लोबल स्पोर्ट्स मैन्युफैक्चरिंग हब, ईस्पोर्ट्स सेक्टर को मिलेगा बड़ा बढ़ावा
सरकार के 500 करोड़ के प्रावधान से खेल उपकरण निर्माण को मिलेगी गति, वैलोरेंट जैसे ईस्पोर्ट्स टाइटल्स के लिए बनेगा बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर

भारत सरकार ने देश को ग्लोबल स्पोर्ट्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। यूनियन बजट 2026-27 में खेल उपकरण निर्माण को बढ़ावा देने के लिए 500 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान किया गया है। यह निर्णय उस समय आया है जब भारत 2026 एथलेटिक्स चैंपियनशिप, 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स और 2036 ओलंपिक्स की मेजबानी की तैयारी कर रहा है।
सरकार की समग्र रणनीति
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 'समर्थ पहल' के तहत न केवल पारंपरिक खेल उपकरणों बल्कि ईस्पोर्ट्स गेमिंग पेरीफेरल्स के निर्माण पर भी जोर दिया है। उन्होंने कहा कि भारत में हाई क्वालिटी के सस्ते स्पोर्ट्स गुड्स तैयार होते हैं जो इसे ग्लोबल हब बनने की क्षमता प्रदान करते हैं। इस पहल से चीन के वर्चस्व को चुनौती मिलेगी, जो वर्तमान में दुनिया के 59% स्पोर्ट्स इक्विपमेंट का निर्यात करता है।
ईस्पोर्ट्स क्रांति के लिए मंच तैयार
इस योजना से ईस्पोर्ट्स इंडस्ट्री को बहुआयामी लाभ मिलने की उम्मीद है। वैलोरेंट जैसे प्रतिष्ठित टाइटल्स के लिए गेमिंग कीबोर्ड, हाई-एंड माउस, हेडफोन्स और स्पेशलाइज्ड गेमिंग चेयर्स का स्थानीय उत्पादन संभव हो सकेगा। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत से वर्तमान में 3,378.49 करोड़ रुपये के खेल उपकरणों का निर्यात होता है जिसमें ईस्पोर्ट्स सेक्टर की हिस्सेदारी बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान परिदृश्य
भारत में स्पोर्ट्स गुड्स मैन्युफैक्चरिंग की शुरुआत 1883 में सियालकोट (अब पाकिस्तान) से हुई थी। 1947 के विभाजन के बाद कारीगर जालंधर और मेरठ आकर बसे, जो आज देश के प्रमुख निर्माण केंद्र हैं। मेरठ में 35,200 से अधिक पंजीकृत इकाइयां हैं जो भारत के कुल खेल उपकरण निर्यात का 40% उत्पादन करती हैं। इन केंद्रों के पास ईस्पोर्ट्स उपकरण निर्माण में भी विशेषज्ञता हासिल करने की क्षमता है।
रोजगार सृजन और आर्थिक प्रभाव
इस क्षेत्र में वर्तमान में 5 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है जिसमें महिलाओं की भी उल्लेखनीय भागीदारी है। स्पोर्ट्स गुड्स इंडस्ट्री का वर्तमान सालाना टर्नओवर 57 हजार करोड़ रुपये है जो 2030 तक 90 हजार 420 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। ईस्पोर्ट्स उपकरणों के स्थानीय उत्पादन से ये आंकड़े और भी प्रभावशाली हो सकते हैं।
निर्यात संभावनाएं और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
स्पोर्ट्स गुड्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (SGEPC) के मार्केट एक्सेस इनिशिएटिव (MAI) और मार्केट डेवलपमेंट असिस्टेंस (MDA) जैसे कार्यक्रमों से भारतीय ईस्पोर्ट्स उपकरणों को वैश्विक बाजार में प्रवेश मिलेगा। 2019-20 में भारत वैश्विक स्पोर्ट्स गुड्स निर्यात में 24वें स्थान पर था जिसकी हिस्सेदारी महज 0.56% थी। नई पहल से यह स्थिति बदलने की उम्मीद है।
ईस्पोर्ट्स इकोसिस्टम के लिए गेम-चेंजिंग अवसर
यह पहल भारतीय ईस्पोर्ट्स को नई ऊर्जा प्रदान करेगी। स्थानीय रूप से निर्मित उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों से वैलोरेंट जैसी प्रतियोगिताओं में भारतीय टीमों की प्रदर्शन क्षमता बढ़ेगी। कम लागत में बेहतर उपकरण उपलब्ध होने से युवाओं का इस क्षेत्र में आना आसान होगा। स्पोर्ट्स मंत्रालय के साथ मिलकर ईस्पोर्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया इस पहल का अधिकतम लाभ उठा सकता है।
चुनौतियां और आगे का रास्ता
SGEPC के चेयरमैन सुमनेश अग्रवाल के अनुसार, स्पोर्ट्स गुड्स पर 18% जीएसटी को कम करने और कश्मीरी विलो की उपलब्धता सुनिश्चित करने जैसी चुनौतियों को दूर करना होगा। इन बाधाओं के समाधान से ही भारत वैश्विक स्पोर्ट्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा कर पाएगा और ईस्पोर्ट्स क्षेत्र में भी नई ऊंचाइयों को छू पाएगा।
